Friday 6 January 2017

मारवाड़ में जागीरदारों की श्रेणियाँ

मारवाड़ में जागीरदारों की श्रेणियाँ
मुगलों मनसबदारी प्रथा से प्रभावित होकर मारवाड़ के राजाओं ने भी अपने जागीरदारों को पद और प्रतिष्ठा के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया। इससे जागीरदारों की आय ओर उनके पद और प्रतिष्ठा का निर्धारण हो गया। मारवाड़ के जागीरदार कई श्रेणियों में विभाजित थे-यथा (1) राजवी, (2) सरदार  (3)  मुत्सद्दी और (4)  गिनायत54 ।
राजा के छोटे भाई व निकट के सम्बन्धी, जिन्हें अपना निर्वाह के लिए जागीर दी जाती थी, राजवी कहलाते थे। इन्हे तीन पीढ़ी तक रेख, चाकरी, हुक्मनामा आदि की रकम राज्य खजाने में जमा नहीं करवानी पड़ती थी। तीन पीढ़ी के बाद राजवी भी सामान्य जागीरदारों की श्रेणी में आ जाते थे।55
मारवाड़ के सरदारों को अनेक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। इनमें सर्वोपरि सिरायत सरदार थे। ये वे ठिकाणेदार थे जिन्हें दरबार में बैठने का स्थान राज्य के पास सबसे आगे मिलता था। प्रारंभ में उनकी संया 8 थी जो कालान्तर में बढ़ कर 12 हो गई।56

ये 12 सिरायत सरदार थे -
ठिकाणा खॉप    मिसल
1. पोकरण चांपावत दाईं
2. आडवा चाँपावत दाईं
3. आसोप कुम्पावत दाईं
4. रीयाँ मेड़तिया बाईं
5. रायपुर उदावत बाईं
6. रास उदावत बाईं
7. निमाज उदावत बाईं
8. खैरवा जोधा बाईं
9. अगेवा उदावत बाईं
10. कंटालिया कुम्पावत बाईं
11. अहलनियावास मेड़़तिया बाईं
12. भाद्राजून जोधा बाईं57
दरबार में उपरोक्त सरदार अपनी मिसल के अनुसार महाराज के दाईं और बाईं और बैठा करते थे। राव रणमल्ल के वंशज (चम्पावत व कुम्पावत) दाईं और राव जोधा के वंशज (जोधा, मेडतिया और उदावत) बाईं और बैठा करते थे।58 अनुसूचित में वर्णित प्रथम तीन सरदारों में से जो पहले आते है वे अपने आने के क्रम के अनुरूप आसन ग्रहण कर सकते थे। इनके बाद के पांच सरदारों में भी यही व्यवस्था लागू थी। अन्तिम चार ठाकुर अपने नियत आसन से पहले का आसन तभी ग्रहण कर सकते थे जबकि उनके वरिष्ठ सरदार दरबार में उपस्थित न हो। सरदारों के बैठने के क्रम को लेकर अनेक अवसरों पर विवाद उठ खड़े होते थे। सिरायत सरदारों के अतिरिक्त अन्य सरदारों की श्रेणियाँ उन्हें प्राप्त होने वाले ताजिम और कुरब के अनुसार निर्धारित होती थी।  दरबार में इनके बैठने की व्यवस्था भी इसी से निर्धारित होती थी।59
गिनायत के ठिकाणे उन ठिकाणेदारों के थे जिन्हें जागीर पट्टा यातो राजघराने से शादी सम्बन्ध के कारण मिली थी या वे राठौड़ों का राज्य स्थापित होने के पहले से ही मारवाड़ के किसी क्षेत्र के स्वामी थे। राठौड़ों का राज्य स्थापित होने पर उन्होंने भी राठौडों का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था। ऐसे ठिकाणे भाटी, कच्छावा, हाडा, चौहान, सिसोदिया, तंवर, जाडेजा, झाला आदि राजपूतों के थे।60
मारवाड़ में मुत्सद्दी जागीरदर भी थे जिन्हें राज्य प्रशासन में कार्य करने के एवज में जागीर प्राप्त थी। उनकी जागीरे उनके सेवाकाल तक ही रहती थी। अपवाद स्वरूप कुछ मुत्सद्दियों को वंशानुगत जागीरे मिली थी।61



ब्रिटिश काल में शासक और ठिकाणेदार के परस्पर सम्बन्ध

ब्रिटिश काल  में शासक और ठिकाणेदार
के परस्पर सम्बन्ध
मराठा सरदारों और पिण्डारी लुटेरे अमीर खां के बढ़ते हस्तक्षेपों, लूट-पाट और आर्थिक मांगों के समक्ष विवश होकर जोधपुर, जयपुर और अन्य राजपूत रियासतों ने अंग्रेजों से संरक्षण की मांग की। गर्वनर जनरल लार्ड हेस्टिंगस के शासन-काल में पिण्डारियों की शक्ति ब्रिटिश सेना ने कुचल दी (1871 ई.)42 ब्रिटिश सरकार ने अमीर खां से हुए समझौते के फलस्वरूप अमीर खां ने अपने सैनिक सभी राजस्थान राज्यों से और किलों से हटा लिए। 1817 ई. के आंग्ल-मराठा युद्ध में मराठों की हार के पश्चात् सिन्धिया ने राजस्थान के राज्यों पर से एक अपना अधिकार त्याग दिया।43 तत्पश्चात्  एक-एक करके सभी राजपूतों राज्यों ने 1818 ई. की संधि द्वा रा ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार कर लिया। इस संधि द्वारा बाहरी रूप से राजपूत राज्य सुरक्षित हो गए तथा आन्तरिक प्रबंध में शासकों को पूर्ण स्वतंत्रता दी गई।44 इस संधि के सरदारों पर पड़ने वाले प्रभाव शीघ्र दृष्टिगोचर होने लगे।राजा को अपने ठिकाणेदारों की अब पहले जैसी आवश्यकता नहीं रही क्योंकि उसका राज्य अब बाहरी आक्रमण से सुरक्षित था। प्रशासन की ओर महाराज मानसिंह द्वारा निरन्तर उपेक्षा दर्शाए जाने पर दरबार में अनेक गुट बन गए। ठिकाणेदारों व मुतसदियों के षडयंत्र के फलस्वरूप शासन सŸा महाराज मानसिंह के हाथों से निकलकर युवराज छŸारसिंह के पास आ गई। युवराज छŸारसिंह की आकस्मिक मृत्यु (मार्च 1818)45 के पश्चात् 1820 ई. में महाराज मानसिंह ने इस स्थिति के लिए जिम्मेदार पोकरण गुट के विरूद्ध गंभीर कार्यवाही करते हुए या तो उन्हें मरवा डाला अथवा उनकी सम्पिŸा जब्त कर ली। इसी क्रम में आसोप, चण्डावल, रोहट, खेजड़ला और निाज के ठिकाणे व सम्पिŸा जब्त कर ली गई।46
अपने ठिकाणों से बेदखल किए गए। अपरोक्त सरदारों ने अन्य राज्यों में आश्रय लिया। इन ठिकाणेदारों ने ब्रिटिश मध्यस्थता के अनेक प्रयास किए। ब्रिटिश सरकार चूंकि आंतरिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं करने हेतु संधिबद्ध थी। अतः वे मध्यस्थता के अधिक इच्छुक  भी नहीं थे। उनके बार-बार आग्रह करने पर पश्चिमी राजपूताना के पॉलिटिकल एजेंट एफ. विल्डर ने उन्हें महाराजा के पास जाने को कहा। पॉलिटिकल एजेण्ट के कहने में आकर वे जोधपुर पहुंचे किन्तु महाराजा मानसिंह के आदेश पर उन्हें कैद कर लिया गया। शीघ्र ही एफ.विल्डर के हस्तक्षेप के बाद वे छूट गए। 1824 ई. में महाराज ने पॉलिटिकल एजेन्ट की मध्यस्थता करने पर सरदारों के ठिकाणे लौटाने का वचन दिया।47 ऐसा ही वचन 1839 ई. में भी दिया पर लागू नहीं किया। सरकार ने भी महाराजा को स्पष्टतः कह दिया कि सरदारों को न्यायपूर्ण विद्रोह पर उनका कोई दायित्व नहीं होगा।48 इसी तरह 1868 ई में ए.जी.जी ने महाराज तरलसिंह को 1857 ई. के विद्रोह में शामिल सरदारों की जमीने लौटाने का निवेदन किया। जिस महाराजा ने नहीं माना।49 महाराजा जसवन्त सिंह द्वितीय के समय सर प्रताप ने ठिकाणेदारों के असंतोष को दूर करने के लिए एक समिति ‘‘कोर्ट ऑफ सरदार’’ गठित की। यह समिति ठिकाणेदारोंके परस्पर झगड़ो की देखभाल करती थी। इसके साथ ही ठिकाणेदारों के सिविल और आपराधिक अधिकारों को परिभाषित एवं वर्गीकृत किया गया। इसके बादसरदार राज्य के पक्के समर्थक बन गए।50
मारवाड़ राज्य पर अंग्रेजी संरक्षण का एक सुप्रभाव यह पड़ा कि अब व्यक्ति के शासन के स्थान पर कानून के शासन की अवधारणा को अमल में लाया जाने लगा।51 राज्य सरकार अब यह सुनिश्चित करती थी कि ठाकुर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करके सामान्य जनता से अन्याय या उनके व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप न करें।52 अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने वाले ठिकाणेदारों को दण्ड-स्वरूप जुर्माना, कैद, अधिकार कम करना, ताजिम, कुरब इत्यादि छीन लिए जाते थे।53 स्पष्टतः ब्रिटिश शासन के दौरान ठिकाणेदारों की स्थिति का स्पष्ट अवमूल्यन हुआ।



मुगलकाल में शासक और ठिकाणेदार के परस्पर सम्बन्ध

मुगलकाल में शासक और ठिकाणेदार के परस्पर सम्बन्ध
मुगल सम्राट अकबर (1555-1607 ई) के शासन काल में मेवाड़ को छोड़कर एक-एक कर सभी राजपूत राज्यों ने मुगल अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने राजपूत राजाओं पर अपना पूर्ण प्रभुत्व स्थापित करने के उद्देश्य से उŸाराधिकार मामलों में हस्तक्षेप किया और अपने कृपापात्रों को राजा बनाया। अकबर ने उŸाराधिकारियों ने भी उसकी नीति को जारी रखा और वे राजपूत राज्यों पर अपना आधिपत्य जमाये रखने में सफल भी रहे। मुगल परस्त राजपूत राजाओं को अब अपने ठिकाणेदारों की पहले के समान आवश्यकता नहीं रही क्योंकि सुरक्षा शान्ति और व्यवस्था के लिए अब उन्हें मुगल सेना का सहयेग कभी भी प्राप्त हो सकता था। इन परिस्थितियें में ठिकाणेदारों की राजनीतिक स्थिति में गिरावट आना स्वाभाविक था। अब ठिकाणेदारों का अपने राजाओं के साथ सम्बन्ध भाई-बन्धु का न रहकर स्वामी ओर सेवक का होने लगा।34 उनकी शक्तिओं और अधिकारों पर अंकुश लगाया जाने लगा। साथ ही मुगल शासको की भांति राजपूत राजाओं ने अपने सामन्तों की अलग-अलग श्रेणियाँ भी निर्धारित कर दी। सामन्तों पर नये-नये करों को लागू किया गया। उनके उŸाराधिकार के मामले में भी अंकुश लगाया गया। इसके साथ ही राजपूत राजाओं ने अपने सामन्तों को अपने अधीन सैनिक सहयोगियों के रूप में मानना प्रारंभ कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि सामन्तों की स्थिति बराबर से गिरकर निम्न स्तर पर पहुंच गयी। यदि कोई ठिकाणेदार विद्रोह करता तो राजा मुगल सेना की मदद से उसे कुचल देने की स्थिति में था। अकबर की अधीनता मानने वाला मारवाड़ का मोटा राजा उदयसिंह ने उन सभी ठिकाणेदारों को दण्ड दिया जिन्होंने उसके प्रतिद्वन्दी भाई चन्द्रसेन का साथ दिया था।35 उसने प्रभावशाली मेड़तियां सरदारों की अधिकांश ठिकाणों को खालसा घोषित कर दिय। उदावतों से जैतावरण छीन लिया तथा चांपावतों की भी बहुत सी ठिकाणों को खालसा मान लिया।36 मारवाड़ के नरेशों ने ठिकाणेदारों पर विभिन कर लगाने के साथ उनके ठिकाणों का मूल्याकंन कर आय के अनुपात से सैनिक बल निर्धारित किया तथा उन पर खड़गबन्धी (तलवार बधाई) का दस्तूर तथा हुकुमनामा अथवा नजराने की प्रथाएं भी प्रारंभ हो गई।37 अतः ठिकाणेदारों ने बाध्य होकर अपनी निम्न स्थिति को स्वीकार किया क्योंकि राजपूत राजाओं को मुगल संरक्षण प्राप्त था।
मुगल शक्ति के पतन के साथ ही राजपूत शासन में परम्परागत कुलीय संघर्ष पुनः प्रारंभ हो गया। अब परिस्थितियों वश राजपूत राजाओं को पुनः ठिकाणदारों केसहयोग की आवश्यक अनुभव हुई। अत सामन्तों ने भी इस स्थिति का लाभ उठाते हुए पुनः अपने प्रभाव को स्थापित करने का प्रयास किया।38 सामन्त पूर्व की भांति उत्तरधिकारी के मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे।39 किन्तु राजपूत राजाओं ने अपनी निरंकुशता एवं अधिकारों को बनाये रखने के लिए मराठों से सैनिक सहयोग क्रय करना प्रारंभ कर दिया40 क्योंकि वे ठिकाणेदारों के अत्यधिक  प्रभाव से मुक्त होने के इच्छुक थे। किन्तु बाद में यह मराठा सहयोग राजपूतों के आर्थिक एवं राजनीतिक हित में हानिकारक सिद्ध हुआ और अन्त में राजपूतों ने ब्रिटिश संरक्षक को स्वीकार करने में अपनी भलाई समझी। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने राजपूतों को प्रत्येक क्षेत्र में निर्बल बना दिया।41



मारवाड में शासक और ठिकाणेदार के परस्पर सम्बन्ध

मारवाड में शासक और ठिकाणेदार के परस्पर सम्बन्ध
मारवाड़ पर अपना आधिपत्य स्थापित करने वाले राठौड़ शव सीहा (लगभग 1212) के वंशज थे। राव सीहा के इन विभिन्न वंशजों ने मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया।22 मण्डोर पर अधिकार करन वाले राव चूण्डा को इन वंशजों ने सहयोग दिया तथा राठौड शाखा का प्रमुख स्वीकार कर लिया।23 परन्तु इन विभिन्न राठौड़ क्षेत्राधिपतियों की स्वतंत्रता पहले के समान रही। मण्डोर के राठौड़ अपने अधिकृत क्षेत्रों पर पृथक प्रशासन चलाते रहे। राव रणमल्ल की हत्या (1938 ई.) के बाद मारवाड़ पर मेवाड़ का अधिकार स्थापित हो गया।24 राव रणमल्ल के तृतीय पुत्र राव जोधा और उसके भाई-बन्धुओं के 15 वर्षो के अथक प्रयासों के फलस्वरूप मारवाड़ स्वतंत्र हुआ (1453 ई.)।  राव जोधा ने विजित क्षेत्रों के प्रशासन के निमित्त विजित क्षेत्र अपने भाईयों व पुत्रों में बांट दिए जो कालान्तर में ये ठिकाणों के रूप में विकसित हुए। कुछ क्षेत्र तो राव मणमल्ल ने अपने पुत्रों को दिए थे जैसे कि अपने द्वितीय पुत्र चाम्पा को कापरड दिया। राव जोधा ने यह प्रदेश राव चाम्पा के पास पूर्ववत रखा।25
इस प्रकार स्वकुलीय और स्वगोपीय भाई बन्धुओं के सहयेग लेने से ही मारवाड में सामन्त व्यवस्था का उद्भव हुआ। राज्य के वल शासन की सम्प ति ही नहीं मानी जाती थी अपितु कुलीय सामन्तों की समाहिक धरोहर माना जाता था। राज्य की स्थापना के साथ ही सामन्तों का अस्तित्व प्रारंभ हो गया था। राजा इन सामन्तों के सहयोग से ही राज्य की स्थापना व इसकी सीमा के विस्तार करने में सक्षम हुआ था। अतः वे सभी अपने को इसका भागीदार समझते थे। उनकी दृष्टि में राजा कुल का प्रधान था। वे अपने को उसके अधीन नहीं बल्कि उसका सहयोगी समझते थे। उनका राजा के साथ सम्बन्ध बन्धुत्व व रक्त, स्वामी और सेवक का नहीं। शासक ओर सामन्त के मध्य भाई-बन्धु के सम्बन्ध के कारण शासक की स्थिति बराबर वालों में प्रथम के समान थी। सामन्त घरेलू और राजनीतिक सभी मामलों में सामाजिक समानता का दावा करते थे।26 ज्ञातव्य है कि ठिकाणा व्यवस्था का उद्भव इसी सामन्त व्यवस्था से हुआ। जब किसी क्षेत्र विशेष से सम्बन्धित अधिकार किसी सामन्त और उसके वंशज को पैतृक आधार पर पीढ़ी दर पीढ़ी प्राप्त हो जाते तो वह ठिकाणा कहलाने लगता था। ठिकाणे का स्वामी ठिकाणेदार कहलाया जाता था। कुलीय भावना के कारण ही राजा अपने ठिकाणेदारों को ‘‘भाईजी’’ और ‘‘काकाजी’’ जैसे आदरसूचक शब्दों से संबोधित करते थे। इसी प्रकार सामन्त राजा को ‘‘बापजी’’ कहकर संबोधित करते थे और ऐसा करने में गर्व अनुभव करते थे क्योंकि राजा उनके वंश का मुखिया था और उनके कुल का प्रतिनिधित्व करता था।27 मारवाड़ में स्वकुलीय ठिकाणेदारों के अतिरिक्त अन्य समकक्ष राजपूत सामन्त भी होते थे। उनका राजा के साथ स्वामी और सेवक का सम्बन्ध होता था। ऐसे सामन्तों का अस्तित्व व सम्मान राजा की कृपा पर निर्भर करता था। ऐसी स्थिति में इन सामन्तों का राजा के प्रति वफादार रहना स्वाभाविक था।29
मारवाड़ में ठिकाणेदार प्रारंभ से ही काफी शक्तिशाली रहे। राज्य के महत्वपूर्ण कार्यो, व्यवस्था और प्रबंध में उनकी साझेदारी रहती थी। इन ठिकाणेदारों की इच्छा के विपरीत शासक के लिए सामान्यतः कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना संभव नहीं था। उत्त् राधिकारी के मामले में भी सामन्तों का दखल रहता था। मारवाड़ के सामन्त तो इतने शक्तिशाली थे कि उन्होंने शासको के निर्णयों का भी एकजुट होकर कई अवसरों का विरोध किया। राव सूजा ने अपने पुत्रों वीरम को अपना उत्त् राधिकारी मनोनीत किया था परन्तु सामन्तों ने वीरम को सिंहासन के योग्य नहीं समझा तथा वीरम के स्थान पर उसके भाई गांगा को गद्दी प्रदान कर दी।30 इसी प्रकार सामन्तों ने राव जोधा के पश्चात् उसके ज्येष्ठ पुत्र जोगा को गद्दी न देकर सातल को सिंहासर पर आरूढ़ किया।31 इस सम्बन्ध में मारवाड़ में एक कहावत प्रचलित थी-‘‘रिड़मला थापिया जिके राजा‘‘32 अर्थात् राव रणमल के पुत्रों ओर वंशजों की सहमती से ही मारवाड़ के राजसिंहासन पर कोई आसीन हो सकेगा।
मारवाड़ में रव गांगा के काल में  सामन्तों की शक्ति बहुत अधिक बढ़ गई। वे सामान्यतः स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करने लगे। राव मालर्दव ने इनकी शक्ति को तोड़ने का प्रयास किया परन्तु उसे इस कार्य में पूर्ण सफलता नहं मिली।33 लेकिन मारवाड़ में सामन्तों के शक्तिशाली होने पर भी उनमें स्वामीभक्ति की भावना प्रबल थी इसलिए मारवाड़ में शक्ति व्यवस्था सामान्यतः बनी रही। ऐसे बहुत कम अवसर आये जब सामन्तों ने विपत्ति के समय अपने स्वामी का साथ नहीं दिया हो।



ठिकाणा व्यवस्था का विकास

ठिकाणा व्यवस्था का विकास
राजस्थान में ठिकाणा पद्धति का उदय कब और किस प्रकार हुआ। इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है। संभवतः राजपूत राज्यों की उत्प ति के साथ ही यह पद्धति स्थापित हो गई थी। यह पद्धति का संबंध सैनिक व्यवस्था और संगठन के साथ था। राज्य के महत्वपूर्ण और विश्वसनीय पद स्वकुलीय सरदारों को दिए जाते थे। युद्ध के अवसर पर सरदार अपने राज्य की सहायता करते थे। उनमें यह भावना निहित थी कि वे अपनी पैतृक सम्प ति की सामूहिक रूप से रक्षा करने हेतु ऐसा कर रहे है।17 इन  सरदारों के जीवन-यापन के लिए उन्हें भू-क्षेत्र दिए जाते थे। महाराजा अभयसिंह के शासन काल में मारवाड़ में जागीर शब्द का प्रचलन नहीं था। अतः जागीर को सनद के रूप में प्रदान किया जाता था। इसे गांव देना या पट्टा देना कहते थे। कालान्तर में इसके लिए ‘जागीर-पट्टे’ शब्द का प्रचलन सामान्य हो गया। जब ये पट्टे पैतृक स्थिति प्राप्त कर लेते तो जागीर पट्टे का क्षेत्र ठिकाणे की श्रेणी में आ जाता था।
यदि किसी अन्य वंश में पूर्व शासक के अधिकांश क्षेत्र पर अधिकार कर लिया हो तो पूर्व शासक के पास बचा क्षेत्र ठिकाणे के रूप में विकसित हो जाता था जैसे कि जालोरा में सेणा ठिकाणा। शासकों द्वारा अपने पुत्रों को दिए गए पट्टे के गांव भी ठिकाणे की श्रेणी में आ जाते थे। इसी तरह भाई-बंट के आधार पर विभाजित भू-भाग भी ठिकाणे का स्तर प्राप्त कर लेते थे जैसे कि नगर व गुड़ा ठिकाणे इसके अतिरिक्त शासक भी अपने सरदारों द्वारा दी गई विशिष्ट सेवाओं के प्रतिफल में कुछ गांव ठिकाणे के रूप् में दे देता था। शासक द्वारा नाराज हो जाने पर या गंभीर अपराध करने  ठिकाणा जब्त भी कर लिया जाता था। ठिकाणे पुनः आवंटित करने से पूर्व पेशकसी वसूली की जाती थी। ठिकाणेदारों को अपने क्षेत्र से सम्बन्धित प्रशासनिक-आर्थिक एवं न्यायिक अधिकार दिए जाते थे।19
स्वकुलीय सामन्त जो अपनी-अपनी  खांप के ‘‘पाटवी’’ थे, अपने अधीन क्षेत्र में एकाधिकार प्राप्त शासक के रूप में आचरण करते थे। ये ठिकाणेदार सम्मानसूचक पद्धतियॉ, यथा रावत, राव रावत राजा, धारण करते थे। सामान्यतः वे ‘‘ठाकुर’’ कहलाते थे। ठिकाणेदार कई खांपो में विभाजित थे। प्रत्येक खांप का एक मुखिया या पाटवी होता था। ठाकुर भी अपने भाई-बेटों के जीवन निर्वाह के लिए अपनी जागीर में से भूमि वितरित करता था। ठाकुर अपने छुट-भाईयों की मदद से अपने ठिकाणे में शान्ति व सुव्यवस्था कायम रखने सम्बन्धी कŸार्व्यों का पालन करता था। ये छुट-भाई अपने ‘‘पाटवी’’ के प्रति पूर्ण निष्ठावान होते थे।20 ठिकाणे की जमीयत बिरादरी की सेना इन्ही छुट-भाईयों की सैनिक टुकड़ियों में बनी होती थी और राज्य के विभिन्न ठिकाणेदारों की सैनिक टुकड़ियों को मिलाकर राजकीय सेना का गठन होता था जिसका प्रयोग देश की रक्षार्थ तथा उसकी सीमा विस्तार हेतु किया जाता था। धीरे-धीरे राज्य में एक ही खांप के कई स्वतंत्र ठिकाणे स्थापित हो जाते थे, फिर भी वे सभी अपने ‘‘पाटवी’’ प्रथम ठिकाणेदार को ही अपनी नेता मानते थे और उसके प्रति उसकी निष्ठा बनी रहती थी। ठिकाणो के सैनिक अपने ठाकुर को ही सर्वस्व मानते थे। राजा के प्रति उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी यदि उनसे प्रश्न पूछ लिया जाता था कि उनकी सेवाएँ किसके प्रति हैं - राजा के या ठाकुर के? तो उनका उत्त् र यही होता था ‘‘राजा का मालिक वे, पाट का मालिक थे‘‘ अर्थात् राजा राज्य का स्वामी है परन्तु मेरे मालिक तो ठाकुर ही है। उसका दायित्व और उसकी वफादारी अपने ठाकुर तक ही सीमित थे। सुमेलगिरी के युद्ध में जनवरी 1544 ई. में राव मालदेव में चले जाने के बाद बहुत से ठाकुर भी रणक्षेत्र से पलायन कर गए थे। उनके साथ उनके सैनिक भी भाग निकले परन्तु जिनके स्वामी वहां डटे रहे उनके सैनिक भी वहां उपस्थित रहे। राव मालदेव के प्रति उनका कोई विशेष दायित्व नहीं था। इस प्रकार उस समय राजपूत राज्य एक शिथिल संघ व्यवस्था के रूप में था जिसमगें अनेक स्वतंत्र व अर्द्धस्वतंत्र प्रशासनिक इकाइयों का जमघट था।21



अध्याय - 1 पोकरण : एक परिचय



अध्याय - 1

पोकरण : एक परिचय 
पोकरण का शब्दार्थ -
पुष्करणा ब्राह्मणों के पूर्वक पोकर (पोहकर) ऋषि द्वारा बसाए जाने के कारण इस स्थान का नाम पोकरण पड़ा।1 आज भी यहां बड़ी संख्या में पुष्करणा ब्राह्मण निवास करते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस क्षेत्र में 18 पोखर (पहाड़ियाँ) और एक रण (नमक की झील) थी इसलिए यह क्षेत्र पोकरण कहलाया।
भौगोलिक स्थिति -
पोकरण शहर 26055‘ उत्तर और 71055‘ पूर्व में स्थिति है। यह जोधपुर शहर के 85 मील (180 किमी.) उत्तर् -पूर्व की ओर स्थित है। पोकरण शहर निम्न भूमि की ओर स्थित है  तथा उत्तर्  दक्षिण और पश्चिम की ओर पर्वतों से घिरा है। जलीय संसाधन अच्छी मात्रा में है।2 पोकरण का भौगोलिक क्षेत्रफल 9,61,354 (9517.08 वर्ग कि.मी) है।3
सीमा -
पोकरण वर्तमान में जैसलमेर जिले का भाग है तथा तहसील मुख्यालय है। आजादी से पूर्व यह जोधपुर रियासत का एक महŸवपूर्ण भाग रहा । पोकरण और उसके आस-पास का क्षेत्र थेरडा नाम से भी जाना जाता है।                               
जलवायु -
पोकरण की जलवायु विषम है। शीतकाल में अधिक शीत और उष्ण काल में अधिक उष्ण है। रेतीली मिट्टी के कारण गर्मियों में रात्रि ठण्डी होती है जबकि दिन काफी गरम होते है। गमियों के दिनों में पूरे इलाके में लू चला करती है। आंधियाँ सामान्य बात है। रेत और गर्म हवा के लघु चक्रवात (र्भभूल्या) गर्मियों के दिनों की सामान्य विशेषता है।
पोकरण में वर्षा शेष भारत या राजस्थान के तुलना में काफी कम है। औसत वार्षिक वर्षा 218 मि.मी. है जबकि इस वर्ष 2005 में वर्षा मात्र 142 मि.मी रही ।4
जनसंख्या -
ठा. मंगलसिंह के समय में पोकरण खास की कुल जनसंख्या 7314 थी, पुरुष 3618 एवं औरते 3696 थी। कुल आबाद घर 1633 थे। पोकरण की जनसंख्या 1901 ई. में मात्र 7,125 थी।5

कृषि-
पोकरण शुष्क क्षेत्र में आता है। निम्नभूमि में अवस्थित होने के कारण पीने के पानी की तो पर्याप्त उपलब्धता है किन्तु कृषि कार्य की दृष्टि से जल अपर्याप्त है। कृषि कार्य के लिए कृषक मानसून की वर्षा या मावट (महावट) पर निर्भर थे। सामान्यतया खरीफ की फसल की उपजाई जाती थी। पोकरण के ठाकुरों को लगभग 100 गांवों का जागीर पट्टा प्राप्त था किन्तु अकाल जल की कम  उपलब्धता, खारा पानी तथा भूमि की कम उत्पादकता के कारण उन्हें भूमि पट्टे अन्य स्थानों पर भी ईनायत किए गए जैसे कि सिवाणा, जालौर इत्यादि।6
अस्पताल एवं स्वास्थ्य केन्द्र -
आजादी से पूर्व पोकरण में एक डिस्पेंसरी हुआ करती थी। इस डिस्पेंसरी का व्यय एवं रख-रखाव पोकरण के ठाकुर के जिम्मे था। 7 पोकरण में एक पोस्ट ऑफिस भी था।

ठिकाणे का अर्थ और इतिहास

ठिकाणे का अर्थ और इतिहास


राजस्थान के राजपूत शासको ने प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण की नीति को अपनाते हुए एक विशिष्ट सामन्तवादी पद्धति को अपनाया। राजपूत शासकों ने अपने राज्य के अधिकांश हिस्सो को अपने ही स्वगोत्रीय वंशज भाई-बन्धुओं में बांट दिया। ये लोग विभिन्न तरीकों से राजकार्य चलाने में शासन को अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया करते थे।9 शासको द्वारा अपने भाई-बन्धुओं और कृपापात्रां को दिए गए भाई-बन्धुओं और कृपापात्रों को दिए गए भू-क्षेत्रों जो कुछ गांवों का समूह होता था, को ही ‘ठिकाणा’10 कहा गया है।


पुराने ऐतिहासिक स्त्रोतों में ठिकाणा शब्द प्रयुक्त नही किया गया है। ठिकाणा शब्द के स्थान पर हमें दूसरे शब्द प्राप्त होते हैं जैसे कि गांव, राजधान, बसी, उतन व वतन, कदीम इत्यादि। इन शब्दों के अर्थ में भी अन्तर है। कुछ बहियो और ख्यातों यथा महाराणा राजसिंह की पट्टा-बही, जोधपुर हुकुमत री बही, मुदियाड़ री ख्यात, जोधपुर राज्य की ख्यात इत्यादि में जागीर के लिए ‘गांव’ शब्द का प्रयोग किया गया है। कालान्तर में महाराणा भीमसिंह कालीन जागीरदारों के गांव पट्टा हकीकत में जागीर के मुख्य गांव के लिए राजधान शब्द प्रयुक्त हुआ है। वहीं नैणसी की ख्यात में और बांकीदास री ख्यात में ‘बसी’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका तात्पर्य है ‘परिवार सहित बसना’। ‘कदीम’ शब्द का उल्लेख किसी जाति  विशेष के एक क्षेत्र पर परम्परागत था पैतृक अधिकार के संदर्भ में किया है11 जैसे कि ‘जैसलमेर भाटियों का कदीम वतन है’।12 फारसी शब्द ‘वतन’ के राजस्थान स्वरूप ‘उतन’ का भी प्रयाग कुछ गं्रथों में हुआ है। यह शब्द भी स्थायी पैतृक अधिकार का बोध कराता है। मुगलकालीन स्त्रोतो में ‘वतन’ शब्द का काफी प्रयोग हुआ है।13


‘ठिकाणा’ शब्द का सर्वप्रथम उल्लेख 17वीं शताब्दी के उत्त् रार्द्ध में लिखित उदयपुर के ऐतिहासिक ग्रंथ ‘‘रावल राणाजी की बात’’ में हुआ है।14 दयालदास कृत देशदर्पण तथा बांकीदास की ख्यात में कालान्तर में इस शब्द का प्रयोग हुआ है। धीरे-धीरे यह शब्द आम प्रचलन में आ गया ‘‘ठिकाणा’’ शब्द राजस्थान, बसी, कदीम, वतन या उतन से अधिक विस्तृत है तथा अर्थ में उपरोक्त शब्दों से भिन्नता भी रखता है। ठिकाणा एक शासन द्वारा सामान्यतया अपने भाई-बन्धुओं को दिया गया, वह अहस्तान्तरणीय पैतृक भू-क्षेत्र या जागीर पट्टे का वह मुख्य गांव था। जिसमें ठिकाणे को प्राप्त करने वाला सरदार अपने परिवार सहित कोट, कोटड़ियों या हवेली में निवास करता था। जागीर पट्टे के सभी गांवों का शासन प्रबंध एवं संचालन इसी प्रशासनिक केन्द्र से किया जाता था तथा इससे राज्य का सीधा संबंध होता था। चारणों और ब्राह्मणों को दिए गए गांव (डोली व सांसण) सामान्यतया इस श्रेणी में नहीं आते थे।15


ठिकाणे के स्वामी ठाकुर, धणी, जागीरदार, सामन्त या ठिकाणेदार इत्यादि नामों से भी जाने जाते हैं। ठिकाणे के संचालन को ठकुराई कहा जाता है। प्राचीन ऐतिहासिक गं्रथों में इस शब्द का प्रयोग किया गया है।16